मुंह को नज़ाकत से दीवार पर टिका कर ज़नाब ने अदा से पान थूका,
और बोले, बर्खुरदार दहेज़ कितना मांगते हो?
हमने एक पल अपनी कीमत के बारे में सोचा,
और उनको बोला,
गुस्ताखी माफ़ करें श्रीमान,
पर अभी तक वो मुद्रा नहीं बनी जो हमारी कीमत आँक सके...
Monday, November 22, 2010
Friday, November 5, 2010
एक ज़माना था...
एक ज़माना था जब हम भी बमबाज़ हुआ करते थे,
सैकड़ों के पटाखे बेदर्दी से छुड़ाया करते थे,
सब भाई महीनो से योजना बनाया करते थे,
कि मोहल्ले में सबसे ऊँचा रॉकेट हमारा जाये,
सबसे तेज़ रौशनी हमारे अनार की हो,
हमारी चकर-घिन्नी नाचते न थके,
और सबसे जोरदार आवाज़ हमारे बम की हो,
एक ज़माना था जब हम भी बमबाज़ हुआ करते थे...
वक़्त बदला, हालात बदले, सोच बदली,
आज जब बच्चे हमारा बचपन दोहराते हैं,
तो क्यों उन पर क्रोध आता है,
क्यों पटाखों की आवाजें अब शोर लगती हैं,
क्यों अनार की रौशनी अब धुंआ लगती है,
आखिर ये बदलाव क्यों,
आखिर क्यों, क्योंकि
एक ज़माना था जब हम भी बमबाज़ हुआ करते थे...
सैकड़ों के पटाखे बेदर्दी से छुड़ाया करते थे,
सब भाई महीनो से योजना बनाया करते थे,
कि मोहल्ले में सबसे ऊँचा रॉकेट हमारा जाये,
सबसे तेज़ रौशनी हमारे अनार की हो,
हमारी चकर-घिन्नी नाचते न थके,
और सबसे जोरदार आवाज़ हमारे बम की हो,
एक ज़माना था जब हम भी बमबाज़ हुआ करते थे...
वक़्त बदला, हालात बदले, सोच बदली,
आज जब बच्चे हमारा बचपन दोहराते हैं,
तो क्यों उन पर क्रोध आता है,
क्यों पटाखों की आवाजें अब शोर लगती हैं,
क्यों अनार की रौशनी अब धुंआ लगती है,
आखिर ये बदलाव क्यों,
आखिर क्यों, क्योंकि
एक ज़माना था जब हम भी बमबाज़ हुआ करते थे...
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